नयी, पुरानी टिहरी


मनोत्री आज सुबह से कुछ अनमनी सी थी | सर्दियों की धूप वैसे भी मन को अन्यत्र कहीं ले जाती है | इतवार का दिन सारे लोग घर पर ही थे, छत पर धूप सेंकने के लिए | जेठ जेठानी, उनके बेटे-बहुएँ, पोता  प्रतीक भी अपनी छत पर घाम ताप रहे थे | ऐसा नहीं कि अलग छत पे हों, दोनों छत मिली हुई थी | लेकिन मनोमालिन्य ने दूरियों को एक छत से ज्यादा बढ़ा दिया था | सुधीर छुटियाँ लेकर आया था, बहू भी साथ आई थी, अमेरिका से | अमेरिका बोलने में जमनोत्री को मे पर काफी जोर डालना पड़ता था | सुधीर के पापा तो सुबह ही उठकर भजन गाने लगते हैं, अभी भी इस आदत को नहीं छोड़ा | 
"बस भी करो, थोड़ा धीमे बोलो या चुपचाप सो जाओ, बच्चे सो रहे हैं |" जमनोत्री ने उलाहना दिया| सुधीर के पापा गाते रहे "इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें..." हारकर जमनोत्री को उठना पड़ा | 

बहू अमेरिका से साड़ी लेकर आई थी | "नहीं मम्मी जी, इसे पहनो... देखो, आप पर कितनी अच्छी लग रही है |" 
जमनोत्री हतप्रभ थी- "उस देश में साड़ी मिलती है क्या ? साड़ी पहनती है तू वहां ?" 
सुधीर नाश्ता करते हुए बोला - "अरे माँ, इसके पास तो इतनी साड़ी हैं कि उनके लिए एक कमरा खाली करना पड़ा हमें वहां |" 
"अच्छा !!!" जमनोत्री ने बनावटी आश्चर्य प्रकट किया | 
"और आप मेरी दी हुई साड़ी पहनती भी नहीं" बहू की नाराजगी जायज़ थी | 
"अरे बेटा, यहाँ कहाँ पहनूं मैं अब ? कभी कभी शादियों पार्टियों में पहन लेती हूँ |"  जमनोत्री बचाव कर रही थी, बहू को दुःख नहीं पहुँचना चाहिए | 
"क्या बात कर रही हो मम्मी जी! अरे वो तो मैं घर में पहनने के लिए लायी थी, आप उन्हें घर पे पहना कीजिये , शादियों में नहीं |" बहू कहीं से भी उनका उपहास नहीं कर रही थी | यहाँ भी हारकर जमनोत्री को बहू की लायी गयी साड़ी पहनकर बैठना पड़ा | 

जेठानी समझदार थी, बाहर से ही घर में चल रहा वातावरण समझ गयीं | "अरे बहू! क्या बात है, क्यूँ  डांट रही हो इसे ?" जमनोत्री की जेठानी ने हल्के माहौल को और हल्का करने की कोशिश की |
"नहीं नहीं मम्मी जी, डांट नहीं रही हूँ, मैं मम्मी जी को कह रही थी कि....और आप भी मेरी दी हुई साड़ी नहीं पहनती |" बहू अब जेठानी से सवाल जवाब करने लगीं | 
"नहीं बेटा, पहनती हूँ..." जेठानी जी भी सकपका गयीं "मैंने अभी स्नान-ध्यान कुछ नहीं किया, उसके बाद पहनूंगी |" 
"आज बहू सबकी तलाशी लेगी |" जमनोत्री को अपनी बहू पर लाड़ आ गया | कभी कभी बच्चों जैसी जिद पे उतर आती है, सुधीर की दादी तो अभी तक हमपे इतने ताने मार चुकी होती कि...खैर जमाना बदल गया है, तो हमें भी बदलना चाहिए "अरे बहू! अब बुढापे में हम लोगों का भी क्या पहनना ओढ़ना | पूरा बचपन और जवानी जंगल में काट दी | घर से निकले मुँह-अँधेरे और जंगल गए घास-पात, कभी लकड़ी लेने, खेतों में काम, बैलों को सानी, दिन भर में इतने काम होते कि किसे याद कि फैशन  भी करना है | हाँ , कभी किसी की शादी-ब्याह के वक़्त देख लिया ऐना तो ठीक, नहीं तो ऐसे ही चल दिए |" 
बहू के मुँह से बेसाख्ता निकल गया -"हाँ तो अब थोड़े ही जंगल में हो |"


प्रतीक भी अब इस ओर नहीं आता, जाने उसकी दादी ने क्या कहा उससे कि अब सिर्फ अपनी छत पे ही खेलता रहता है | जमनोत्री ने नन्हे प्रतीक को अपनी गाडी को उलट पलटकर ठीक करते हुए देखा | पिछली छुट्टी में सुधीर लेके आया था प्रतीक के लिए, अमेरिका से | "ए प्रतीक! इधर आ!" जमनोत्री ने पुकारा | प्रतीक ने सर उठाकर देखा, और फिर सर झुका लिया "देख नहीं रहे, मैं अभी बिजी हूँ|" प्रतीक भी बिजी था, प्रतीक की दादी ने स्नान-ध्यान करके बहू की दी हुई साड़ी पहनी थी | इधर सुधीर के पापा धूप में चटाई बिछा के लेट गए और अखबार पढ़ने लगे | अभी थोड़ी देर में अखबार पढ़ते पढ़ते ही सो जायेंगे | सुधीर इस बीच छत पे आ गया, अपने मोबाइल पे गाने बजाने लगा | जरूर सुधीर ने बहू के साथ कुछ चुहल की होगी, तभी भागते भागते छत पे आया है | जमनोत्री का अनुमान बिलकुल सही था, बहू भी पीछे पीछे छत पे आई, और आँखों ही आँखों में सुधीर से गुस्सा भी थी |


रास्ते में लगे हुए पेड़ों की शाखाएं बिजली के तारों को छूने लगे थे | एक निश्चित समय अंतराल पर उनकी शाखाएं काटने के लिए बिजली विभाग किसी को भेजता था | खट-खट की आवाज आने लगी, और एक शाख काट दी गयी | शाख के गिरते ही छत की आखिरी छोरों पे खड़ी जमनोत्री और उसकी जेठानी की आँखों आखों में ही कुछ बातें हुई | फ़ौरन से दोनों उठ गयी | मंहंगी अमेरिकन साड़ी के आँचल को कमर में बाँधा, और दोनों चल पड़ी टूटी हुई शाखें उठाने के लिए | "मम्मी जी कहाँ जा रही हैं ?" बहू ने सुधीर से पूछा | सुधीर का ध्यान रास्ते पे गया, जहाँ जमनोत्री टूटी हुई डाल को कंधे पे उठा के विजयी मुद्रा में चली आ रही थी | उनके पीछे ही जेठानी भी दूसरी डाल लेकर आ रही थी | "माँ! क्या कर रही हो उनका ?" सुधीर ने जिज्ञासा प्रकट की | जमनोत्री का ध्यान सुधीर की बातों पे नहीं था, जेठानी एक डाल अपनी छत पे रखके दूसरी लेने के लिए जल्दी कर रही थी | जमनोत्री ने जल्दी से डाल रखी और चली गयी | सुधीर के पापा ने धूप में लेटे लेटे एक आँख खोली | "पिता जी! माँ ये डालें क्यों ला रही है ? क्या करेगी इन लकड़ियों का ?" सुधीर ने माँ की ओर दिखाकर पूछा | जमनोत्री ने कटी शाखों का गट्ठर बना लिया | उसे पीठ पर लादकर लाने लगी | "पता नहीं बेटे! तभी तो मैं इसे गंवार कहता हूँ |" सुधीर के पापा हँसते हुए बोले | "अरे सूखी लकड़ियाँ बहुत काम आती हैं |" जमनोत्री ने झुके झुके ही जवाब दिया | सुधीर के पापा ने गट्ठर को पीठ से उतार दिया | "लेकिन अब तो गैस है, और नहाने के लिए गीज़र है बाथरूम में | फिर भी ?" सुधीर ने अपना तर्क प्रस्तुत किया | जिस पर जवाब देने की जमनोत्री की कोई इच्छा नहीं थी | सुधीर के पापा, जमनोत्री का ये भाव समझ गए | "और रखोगे कहाँ ? छत पे ? छत खराब हो जायेगी |" सुधीर ने आखिरी तर्क प्रस्तुत किया | "ए जमनोत्री! और भी हैं अभी वहां, रास्ते के दूसरी तरफ, जल्दी चल" छत के दूसरे छोर से जेठानी की आवाज आई | 

सुधीर चुपचाप माँ को शाखें ला लाके इकट्ठी करता हुआ देखता रहा | बीच बीच में सुधीर के पापा, सुधीर की ओर देखकर सांत्वना भरे स्वर में कहते रहे "गंवार है, कभी शहर देखा ही नहीं, तो ये हरकत तो करेगी ही |" सुधीर जानता था कि पापा की इसमें मौन सहमति है | बहू अपनी अमेरिकन साड़ी की दुर्दशा देख रही थी | सड़क के दूसरे छोर से जमनोत्री और जेठानी खिलखिलाते हुए आ रहे थे | प्रतीक भी एक छोटी सी डाल कंधे पे लादके चला आ रहा था, उन छोटे छोटे बच्चों की तरह जो बड़ी दीदी के साथ पहली बार स्वेटा पीठ पे बाँध के घास-पात लेने जाते हैं | इधर सुधीर के मोबाइल पे गाना अभी भी बज रहा था

 'अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूँ,
  अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ|'

रामकथा - डेमोक्रेसी काण्ड

(अगर इस कहानी के पात्र काल्पनिक है, तो ये वास्तविकता नहीं, बहुत बड़ा षड्यंत्र है)

कैकेयी कोपभवन में थी, दशरथ आये, लाइट ऑन की, चेयर खींच के बैठ गए | लॉर्ड माउंटबेटन अभी भी नाराज बैठी थी, दशरथ की आँखों से हिन्दुस्तान की बेबसी झलक रही थी | "आपने दो वचन देने का वादा किया था, याद है न ?" अँगरेज़ सरकार अभी इतनी आसानी से माल-मत्ते वाला देश छोड़ने को तैयार न थी |
"हाँ प्रिये!" नेहरूजी का डर सतह पर आ गया |
"मेरा पहला वचन है कि अयोध्या में इस बार बड़ा बेटा गद्दी पर नहीं बैठेगा | देश में अब डेमोक्रसी होगी | हर कोई , हर किसी का शोषण नहीं करेगा | आम चुनाव से चुने गए ख़ास आदमियों को ही शोषण का हक होगा |"
दशरथ नाराज तो बहुत हुए किन्तु माउंटबेटन के बेलन को स्मरण कर चुप रह गए| "अपना दूसरा वचन कहो महारानी कैपिटलिस्ट!"
उद्धरण सुनकर कैकेयी मुस्कुराई | "सुमित्रा के पुत्रों को चुनाव लड़ने का हक नहीं होगा |"
दशरथ ने दिल पर हाथ रखा किन्तु हृदयगति नहीं रुकी, "तुमने राम के लिए वनवास तो माँगा ही नहीं ?" माउंटबेटन  ने बड़े बेपरवाह भाव से जवाब दिया - "अयोध्या में ही कौन सा राजमहल है अब |"

महामंत्री सुमंत हमेशा की तरह खादी की धोती, और एक चश्मा पहने खड़े थे | चश्मा उनके व्यक्तित्व से कुछ यों जुड़ गया था कि वे अब पर्दा गिराकर ही चश्मा उतारते थे | "राम और भरत के बीच में खाई और चौड़ी हो जाएगी |"
दशरथ चिंतित स्वर में बोले "धीरुभाई ने कैसे दोनों लौंडों को मेनेज किया था ?"
सुमंत चुप ही रहे, "सबको सन्मति दे भगवान |"
दशरथ को बीच बीच में सुमंत पे गुस्सा बहुत आता था, बेबात गाने लगता | अहिंसा परमोधर्म उन्हें भी उसी दिन से लगने लगा था जिस दिन अनजाने में वो किसी बेचारे श्रवण कुमार पर तीर चलाकर आये थे | इसके पश्चात उन्हें सुमंत ने समझाया कि बिना हिंसा के भी अभीष्ट पाया जा सकता है | कथा के अनुसार जब अटल जी से पूछा गया कि विप्रवर! बताइए बाबरी मस्जिद किसने तोड़ी | तो अटल जी ने धीर गंभीर शब्दों में आँखें बन्द कर पूरे दस मिनट तक स्वरचित 'काल के कपाल' सुनाई थी | फैसले का तो पता नहीं क्या हुआ, लेकिन जज साहब को शाम को अपने कपाल पर अमृतांजन बाम लगाना पड़ा | अगले दिन से उन्होंने प्रक्टिस छोड़ दी | 

राम ने सुना तो दुखी हुए, लेकिन उन्हें पता था कि प्रजा में उन्होंने अपनी छवि बहुत अच्छी बना रखी थी | आज ही तो कुलवंती काकी के घर पे उन्होंने चाय पी | कुलवंती थी या धनवंती ... पता नहीं, कल न्यूजपेपर में पढ़ लेंगे यार | भरत प्रजा में जिन्ना की तरह थे, जिसे पब्लिक सिर्फ दूर से देखना पसंद करती थी | लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने राम और भरत की पार्टी ज्वाइन कर ली | घर के गैलरी में क्रिकेट खेलते वक़्त होने वाली झड़पें अब अक्सर हिंसक रूप ले लेती | भरत आजकल लाहौर गए हुए थे, और समझौता एक्सप्रेस भी बन्द पड़ी थी, सो उन्हें वक़्त पर खबर नहीं मिल पायी | शत्रुघ्न आकस्मिक वेग से भरत के चुनाव प्रचार की ध्वज संभाले हुए थे, लेकिन राम मंझे हुए खिलाडी थे | आरोप प्रत्यारोप के दौर चलने लगे, "एक युवराज की तरह पाले गए राम क्या समझेंगे जनता का दर्द..." आजतक वालों के विशेष हवाले से खबर अयोध्या के कोने कोने में हलचल मचाने लगी | 

अयोध्या वालों की सहानुभूति पाने के लिए राम ने नया दांव खेला | राम चित्रकूट में कुटिया बनाकर रहने लगे | यह मेड इन चाइना फोल्डेड कुटिया थी | जिसने भी सुना तुरंत ह्रदय उमड़कर आ गया, "अरे उन जैसा सुकुमार कैसे रहेगा वहां ?" सीता अपने सधे हुए हाथो से चित्रकारी करती, "कृपया राम को ही वोट दें, हमारा चुनाव चिन्ह है धनुष" लक्ष्मण रात को पम्पलेट कृषि भवन या बेसिक स्कूल की दीवारों पे चिपका आते | जब भरत वापस आये तो उन्होंने पहले राम को भगाने पे शत्रुघ्न की पीठ ठोंकी, फिर उसके बाद अचानक एक करारा थप्पड़ रसीद कर दिया | शत्रुघ्न को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन दरवाजे पे पत्रकारों की भीड़ को उमड़ते देखकर कुछ कुछ समझ आने लगा था | भरत ने प्रेस कांफ्रेंस में राम की बहुत तारीफ की, बड़े बड़े आंसू बहाए | "अबे यो तो दिखावा है |" एक ताऊ ने खैनी भरे मुँह से कहा, पीक कैमरे पर गिरी, वीडिओ ढक गया | लगा कि आकाशवाणी का नजीबाबाद केंद्र होगा | रात को भरत ने जब पुनर्प्रसारण देखा तो उन्होंने आजतक के ऑफिस में फ़ोन करके इसके कुपरिणाम भुगतने की धमकी भी दी |

भरत अपने साथ पूरे अयोध्या को लेकर आये | बाबा रामदेव भी साथ आये थे, क्योंकि आस्था चैनल के साथ कांट्रेक्ट का उल्लंघन वो नहीं कर सकते थे | इस जनसमूह में वो लोंडे लपाड़े ज्यादा थे जिन्हें मुफ्त का घूमना, खाना मिल रहा था | कॉलेज बंक करने का उनके पास आज पूरा बहाना था | लडकियाँ जरूर कुछ कम आई थी, जिसकी शिकायत ये लौंडे समुदाय शत्रुघ्न से बार बार कर रहे थे | शत्रुघ्न पहले से ही काफी परेशान थे, काफी चीजें लानी थी | श्रुतकीर्ति हमेशा उनके पास कोई न कोई लिस्ट पकड़ाती रहती है, जैसे एस एम कृष्णा पाकिस्तान को पकडाते हैं, "ये ये आतंकवादी ले आना यार, और हमारे हवाले कर देना जब अगली बार मिलोगे तो |"
कुरैशी हर बार भूल जाते, "अरे यार! तुम एक मिस्काल मार देते तो याद रहता | चलो कोई नि, अगली बार ले आऊंगा | कहीं भाग थोड़े ही रहे हैं आतंकवादी |"
कृष्णा कहते, "हुंह, जाओ मैं तुमसे बात नहीं करती |"
कुरैशी का दिल मोंम हो जाता, "ओबामा ममा, इसे समझाओ न ... देखो ये मुझसे बात नहीं कर रही |"
कृष्णा सास का सम्मान करने की पुरानी भारतीय परंपरा से हैं | चुपचाप चाइनीज़ हक्का नूडल्स में टोमाटो सौस लेते हुए खिलखिलाती हैं "उन्ह!!! तुम भी न... मैं तो मजाक कर रही थी |"

इन लौंडों के बिना ये कथा पूरी नहीं हो सकती | ये वे थे जो खुद को गरीबों का मसीहा कहते थे | हर मुद्दे पर इनकी कड़ी नज़र थी | चाहे वो सुषमा आंटी की लड़कियों का अफ़ेयर हो या नक्सलवाद ... चाहे मंदिर-मस्जिद विवाद हो या कश्मीर, या फिर दारु का ब्रांड, कभी कभी चिलम के दौर पर भी | ये ग़ज़ल पढ़ते, कहानी लिखते | रुचिका केस पे टेसू बहाके सामने सेठीजी की लड़की को इशारा करते "ऐ चलती क्या ?" आश्चर्यजनक रूप से इनका हर कार्य देश को गाली मारने पे ख़त्म होता | अगर कोई इन्हें रोकता तो ये कहते कि इस देश में देशभक्ति बड़ी सस्ती चीज़ है, पाकिस्तान को चार गाली दो और देशभक्त बन जाओ | देशविरोधी बयान देकर ये बड़े सस्ते में राममनोहर लोहिया, जेपी नारायण या बाबा नागार्जुन बन जाते हैं |

इस बीच राम चुनाव प्रचार में गहरे उतर गए थे | अखबार वाला जंगल के शुरू में ही अखबार डाल देता, जिसे लक्ष्मण को लाना पड़ता | इसमें राम को अपने बारे में कई दुष्प्रचार भी मिलते कि वे सिर्फ सवर्णों के ही हक की बात करते हैं | राम को सवर्ण शब्द  से सुमंत काका का स्मरण हो आया | सुमंत काका, जिन्होंने अछूतों को सबसे पहले हरिजन कहा था | वैसे ऐसे लोगों की भी देश में कमी नहीं थी जो कहते कि सुमंत काका सवर्णों को परिजन कहते थे | खैर राम ने दलित वोट बैंक के बारे में सोचा, और प्रखर दलित नेता निषाद राज गुह से मिलने का कार्यक्रम बना लिया | लक्ष्मण से मिली जानकारी के अनुसार निषादराज गुह पहले चीन में भारत के राजदूत थे, आजकल बदहाली में राजदूत मोटरसाइकिल पे दूध बेचते हैं | लक्ष्मण की जानकारी से यह भी पता लगा कि वे काफी सौम्य, मृदु और इमोशनल टाइप बन्दे है | निषादराज प्रकाश राज के फैन हैं | 

निषादराज वाकई काफी सुलझे हुए इंसान थे | वे इतने सुलझे हुए थे कि आकर राम के पास ज़मीन पर बैठ गए | लक्ष्मण ने तुरंत मेड इन चाइना फोल्डेड कुर्सी लगा दी | निषादराज ने संकोच किया तो राम ने उन्हें खुद अपने हाथों से 'स्पर्श' करके कुर्सी पर बिठा दिया, इस पोज़ की कई तसवीरें अलग अलग एंगल से ली गयी | निषादराज ने पूछा - "प्रभु! आप महाराष्ट्र न जाकर इस बियाबान में क्यूँ बनियान सुखा रहे है ?" जवाब में राम ने लक्ष्मण की ओर इशारा कर दिया, लक्ष्मण तुरंत पलटे ओर पीठ पर नील निशान दिखने लगे | लक्ष्मण की आँखों में वही खौफनाक मंजर उठा, "हम यू पी के हैं न | और वैसे भी, वहां लैंड स्कैम भी बहुत हो रहे हैं |" जाते वक़्त राम ने निषादराज को गले से लगाया | निषादराज के पास बयान करने को शब्द नहीं थे, उनकी आँखों से इस सम्मान पर झर झर से आंसू झरने लगे | उन्होंने केवट को वहीं  पे खड़ा कर दिया कि जैसे ही राम बोलें चलो, नाव लेके सीधे पार करा देना | राम मन ही मन बड़े पछताए कि ये तो पूरी तरह से पार भेजने के ही मूड में है | ताजा जानकारी मिलने तक केवट नाव से अभी तक बाहर नहीं आया |

सुबह कपालभाती, अनुलोम विलोम करने के उपरांत भरत जनसमुदाय के साथ चित्रकूट की ओर चले | लक्ष्मण ने धनुष तान लिया, "भैया! भरत इधर की ही तरफ आ रहा है |" राम ने लक्ष्मण को तीर चलाने की नेट प्रक्टिस करने कहीं ओर भेज दिया | भरत आते ही राम के चरणों में गिर गए | आजतक, एन डी टी वी, इंडिया टी वी वाले लाइव फुटेज के लिए आपस में लड़ मरे | ये पानीपत का चतुर्थ युद्ध था | जिसे आप रोहिंटन मिस्त्री जी की बुक में पढ़ सकते हैं | भरत रो रोकर जी हलकान कर रहे थे | सीता बोर होने ही लगी थी कि भरत ने उनके भी चरण पकड़ लिए | ये सीता के लिए असल अग्निपरीक्षा की घडी थी कि चाहे जो हो जाए उन्हें इरिटेट नहीं होना है, नहीं तो पति का रहा सहा वोट बैंक भी चला जाएगा | राम भरत का ये ड्रामा जानते थे, लेकिन उन्हें भरत की इस पोलिटिकल सूझबूझ पर यकीन नहीं हो पा रहा था | राम ने जनसमुदाय को देखा, तीनों माताएं आई हुई थी .. नहीं नहीं वे भरत को इतना राजनैतिक ज्ञान नहीं दे सकते.. गुरु वशिष्ठ ... नहीं वे शिष्ट इंसान हैं...अरे वहां कौन खड़ा है, लाठी लिए.. और खद्दर पहने .. महामंत्री सुमंत ...तो ये सुमंत काका थे जिन्होंने पार्टी बदल ली थी | महामंत्री सुमंत राम से नजरें नहीं मिला पा रहे थे, जैसे कह रहे हों कि राम मुझे माफ़ कर दो | राम जानते थे कि बिना सुमंत के वो कुछ नहीं कर सकते | राम को अर्धनिद्रा में लगा कि वे आडवाणी हैं और सुमंत अटल बिहारी, तो लक्ष्मण गडकारी |

भरत अपने साथ निषादराज को भी लेके आये थे | भरत ने जब सुना कि निषादराज को राम ने गले लगाया तो उन्होंने दो कदम आगे जाकर निषादराज के चरण ही पकड़ लिए | "यो देख, फिर डिरामेबाज़" खैनी वाले ताऊ  ने फिर उच्चारा | लौंडा समुदाय भी भरत की इस हरक़त के पोलिटिकल मोटिफ देखने लगा, और नारेबाजी करने लगा | जाने कहाँ से शत्रुघ्न दारु -मुर्गा लेकर आये, तब नारेबाजियां थमी | निषादराज अभी तक राम से हुई मुलाक़ात के सदमे में ही थे, अकस्मात आये इस झटके से उनकी ह्रदय गति रुकते रुकते बची | "आप मेरे लिए बड़े भाई के समान है |" भरत की आँखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे | राम जानते थे कि भरत ने ये कहकर एक तीर से दो शिकार किये हैं | एक तो उन्होंने दलित और पिछड़ी जातियों का समर्थन हासिल किया, दूसरे उन्होंने राम को उनकी औकात याद दिला दी कि वो राम को निषादराज से ज्यादा ऊपर नहीं समझते | अभी तक 'डिरामा' देखने आये ताऊ की आँखें भी नम होने लगी थी | राम को लग गया कि अब भरत के कहने पर अगर अयोध्या चला गया तो भरत का चुनाव जीतना निश्चित है | राम ने अपने को कई बार कोसा भी कि जाने किस कुघड़ी में उन्होंने यहाँ का टूर का प्रोग्राम बनाया | भरत अपने आप ही प्रेस कांफेरेंस को संबोधित करने लगे कि राम वापस नहीं आना चाहते | ये कहते ही भरत दहाड़ें मारकर रोने लगे, लौंडा समुदाय राम को निष्ठुर होने पर ताने मार रहा था | भरत बोले, "प्रभु नहीं आना चाहते तो ना आओ, लेकिन हमें सहेजने के लिए अपनी चरण पादुकाएं दे दो |" राम जानते थे कि लन्दन से आये इन चप्पलों पर भरत की नजर काफी पहले से है, लक्ष्मण ने उन्हें आगाह भी किया था | सारे दांव उलटे पड़ रहे थे, और राम भाग्य के हाथों विवश हो रहे थे | भरत की दूरदर्शिता के किन्तु राम कायल भी हो रहे थे | भरत ने चप्पल भी ले ली, जनता की सहानुभूति भी, और राम को कहीं का भी नहीं छोड़ा | राम को लगा कि वे थोड़ी देर और रहे तो भरत कह उठेंगे कि भरत का काटा हुआ तो चप्पल भी नहीं पहन पाता |  राम चुपचाप चप्पल देने ही वाले थे कि लक्ष्मण ने उनका हाथ रोक लिया, "प्रभु ये क्या कर रहे हैं आप ? ये चप्पल इसके सर पर मारिये और अयोध्या वापस चलिए |" राम ने एक नज़र लक्ष्मण को देखा, "लक्ष्मण खुद को पहचानो, तुम सुमित्रानंदन लक्ष्मण हो, वी वी एस लक्ष्मण नहीं कि पारी ख़त्म होने पे भी बल्ला भांजते रहो |"

कुछ दिनों बाद महामत्री सुमंत की किसी ने हत्या कर दी | जिस पर राम और भरत के समर्थक गाहे-बगाहे एक दूसरे का सर खोल देते हैं | किसने की, इसकी जांच आज तक जारी है | भरत ने १४ सालों तक राम की चप्पलों को राजगद्दी पर रखा, और राज्य किया | इस दौरान देश में इमरजेंसी लगा के रखी, और चुनाव नहीं हुए | इन १४ सालों में राम की चप्पलें वहीँ राजगद्दी पर रहीं | वैसे ही जैसे, मनमोहन जी सोनिया जी के हाई हील के सैंडलों को पी एम की कुर्सी पर रखकर देश चलाते हैं | बीच बीच में मनमोहन जी को जब कोई पसंद नहीं आता तो वहीँ से वो सैंडल फेंक के मारते हैं | निशाना इतना सधा हुआ होता है कि सुदूर देशों तक लगता है | राग रंग के नए नए मेले इस देश में लगते हैं, जिनमे पब्लिक को भी बड़ा मजा आता है | किसको चाहिए रामराज्य, राम आयेंगे तो पचास सवाल जवाब करेंगे, इससे तो बिना रामराज्य के भले | इस बीच दस्तावेज गायब हो गए कि राम कहाँ पैदा हुए थे | कोई कहता यहाँ, कोई कहता वहां | जिसकी जहाँ मर्ज़ी आई उसने वहां राम की मूर्ति लगायी, ये अलग बात थी कि कोई नहीं चाहता था कि मूर्ति के बजाये राम वहां पे साक्षात हों | लोग एक दूसरे को राम का नाम लेकर डराते धमकाते थे | समाचार लिखे जाने तक राम वापस नहीं आये हैं, लेखक ने उम्मीद भी छोड़ दी है |


आछरियाँ




स्थान : पौड़ी 
दिनांक : १-१-२००७ 
समय : १०:४५ पूर्वान्ह
नए साल की नयी सुबह | पौड़ी की सर्दियाँ बहुत खूबसूरत होती हैं, और उससे भी ज्यादा खूबसूरत उस पहाड़ी कसबे की ओंस से भीगी सड़कें | सुबह उठते ही एकदम सामने चौखम्भा पर्वत दिखायी देता है | कौन रहता होगा वहां ? इंसान तो क्या ही पहुंचा होगा | क्या कोई देवता ? माँ कहती है कि आछरियाँ(परियाँ) ऐसी जगहों पर रहती हैं जहाँ तुम्हारा ध्यान  बार बार जाए, वो जगह इंसानों के लिए दुर्लभ हों | माँ कहती कि ऐसी जगहों पर नहीं जाना चाहिए, और अगर कुछ तुम्हें दिखायी भी दे तो अपनी आखों पे भरोसा मत करना | यह सब छल है, डरना मत बिलकुल भी | आछरियाँ किसी पर मुग्ध होती हैं, किसी की बातों पर, किसी की सच्चाई, अच्छाई पर तो उसे छल दिखाती हैं | फिर उसी छल से उसको अपने साथ अपने लोक में लेकर चली जाती हैं | गडरिये की कहानी, जिसे आछरियां लेके चली जाती हैं, किसी पहाड़ी पत्रिका में पढ़कर मैं थोडा सा सिहरा जरूर था, लेकिन दिल ही दिल में अच्छा भी लगा कि काश मुझे भी कोई लेके चला जाता | माँ एक कहानी और भी सुनाती है, क्या थी वो कहानी मुझे याद नहीं, बस एक वाक्य याद है कहानी में | कहानी में एक चिड़िया का जिक्र होता है जो 'बाट क अबाट! अबाट क बाट' की चिहुंक लगाये रहती है | शायद इसका मतलब है कि सही रास्ते छल रास्ते है, और छल रास्ते सही | कोई नहीं जानता कि क्या सही है और क्या छल | वो चिड़िया किसी पथिक को उसके रास्तों से भटका ले जाती है | पहाड़ी कहानियों में किरदार पेड़-पौधे, जंगल-जानवर, आछरियाँ, नाग, देवता, पितर इत्यादि होते हैं | माँ को पता भी है कि मैं बहुत डरता हूँ, हर चीज़ से | काला धागा मेरे गले में मंत्रसिद्ध करवाया था, जिसे मैंने सातवीं क्लास में एक दोस्त के ललकारने पे तोड़ दिया था | मुझे हर वक़्त किसी के होने का अहसास बना रहता था | डर तो नहीं, लेकिन अजीब सिहरन जरूर पैदा होती थी |
 
चौखम्भा इतना खूबसूरत न लगता अगर बीच में एक छोटी सी पहाड़ी पे माँ दुर्गा के मंदिर की पीले रंग की पताका न दिखती तो | हॉस्टल के आसपास के वीराने में एकाएक मंदिर मानो चौखम्भा से स्पर्धा करता | अलसुबह भी कुछ लड़के कॉमन रूम में पहुँच कर टी वी चलाकर न्यूज़ या गाने देखने लगते, या अपने ही रूम पे कंप्यूटर पे कोई ताज़ा हिट हुआ गाना चला देते | लेकिन मेरे जैसे कुछ लोगों के लिए दिन शांत था | इंडिया टी वी वहां पर नहीं था, और अखबार दो-तीन दिन बाद पहुँचता था | किसी तरह की कोई जल्दी नहीं | कभी कभी रात को लाइट भी चली जाती थी | फिर तो यादों का समां बंध जाता था | कुछ दिन मैंने मंदिर के पीछे पहाड़ी के ढलान वाले हिस्से से नीचे बसे हुए छोटे छोटे गाँवों को देखते हुए भी गुज़ारे थे | इतनी सुबह, ऐसी ही जगह पर मेरे बचपन का डर फिर शक्ल लेता था कि कोई मेरे साथ है | देखो, उसकी आँखें भी मुझे दिखायी दे रही हैं | अब चेहरे ने शक्ल लेनी शुरू कर दी है | हाथ बढ़ा लूँ तो शायद छू सकता हूँ उसे | ये छल है, अपनी आँखों पे भरोसा मत करो, माँ की बातें याद आती है | मैं दूसरी तरफ देखने लगता हूँ, फिर वापस देखता हूँ | वो चेहरा अब नहीं है | काश उन पलों में मैं दूसरी तरफ नहीं  देखता तो ये छल मुझे लेके चला जाता | सूरज निकलने वाला था | गणेश भाई की कैंटीन तक जाने वाली पगडण्डी पर से उगता था सूरज , मानों वही से दिन भर का लम्बा सफ़र तय करेगा | एक बूढा भी उसी रास्ते से आता था रोज़ सुबह, रात का चौकीदार था कहीं | सदियाँ कितनी ही लम्बी क्यों न हो, लगातार चलता हुआ वक़्त सबको मामूली बना देता है | जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी जीवन ठहरता नहीं है | "क्या वो बूढा भी छल है ?" मैं माँ से पूछता हूँ | गणेश भाई की केन्टीन में चाय-समोसे का लुत्फ़ उठाते मैं और रोहित | रोहित की दो महीने पहले किसी लड़की से मुलाक़ात हुई थी | मोबाइल नम्बर्स का आदान-प्रदान हुआ, और बातें होने लगी | अक्सर हॉस्टल की लॉबी में उसे बादलों को छूते हुए देखता हूँ | खिड़की खोलते ही हल्के हल्के जहाँ नमी कपड़ों को भिगो देती है, वहां वो बेचारा ठण्ड से ठिठुरता हुआ खड़ा रहता है | आज उसके साथ पौड़ी जा रहा हूँ, उसकी फ़ोन-फ्रेंड से मिलने | "पता नहीं, किस गढ़वाली घसियारिन से प्यार हुआ होगा तुझे ?" मैं कहता हूँ, रास्ते में आई झाड़ियाँ हटाते हुए | हम दोनों हॉस्टल से नजरें बचाते हुए जा रहे थे, उसी पगडण्डी पर जहाँ से सूरज निकलता है |

आज पहली सुबह है नए साल की तो यकीनन सारे दोस्त लोग, लड़के-लड़कियां, सीनियर-जूनियर आज पौड़ी घूमने के लिए आयेंगे | इसके अलावा हमारे कॉलेज के पास कोई विकल्प भी नहीं है |
"वे सब लोग कंडोलिया मंदिर की तरफ जायेंगे, हम दूसरी तरफ निकल जायेंगे, श्रीनगर वाली रोड की तरफ " रोहित हँसते हुए कहता है "बाद में जब मैं उससे मिल लूँगा तो तू कंडोलिया वालों के साथ हिल मिस्ट में चले जाना, वहीँ जायेंगे वो लोग खाना खाने |"
कंडोलिया गया था मैं एक बार | दूसरी क्लास में कंडोलिया घूमने के लिए स्कूल का टूर गया था | घर आकर मैंने माँ के पैरों को पकड़कर अपना मुँह छुपा लिया था उसके आँचल में | "माँ! आचार जी कहते हैं कि वहां पे स्वर्ग है | माँ चलो न, हम लोग वही पे रहेंगे | ठीक है न ?" माँ हँस रही थी जो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था | मैं पूरी तरह से सीरिअस हूँ, और माँ मजाक बना रही है | "ठीक है, ठीक है, पहले बड़ा हो जा, फिर सोचना |" शीतल ने मुझे धक्का देकर जब पानी पहले पिया तो अपनी गढ़वाली हिंदी में सकपकाते हुए मैंने पूछा, "ये तुमारा है ? यख म तुमारा नाम लिखा है ?"और उसने उंगली से वहां को इशारा किया जहाँ शीतल जल लिखा हुआ था | "वो मुझे छछूंदर कहती है माँ, मुझे तो पता भी नहीं वो कैसा दिखता है... माँ, क्या शीतल भी आछरी है ?"

कॉलेज गेट पर एंट्री कभी करनी पड़ती है, कभी नहीं | आज नहीं करने का दिन था | वैसे भी हम लोगों की गार्ड से जान पहचान बन गयी थी | पौड़ी जाने के लिए ट्रैकर लगा हुआ था | हम लोग पीछे की सीटों पर बैठ गए |
"चल नौना(बच्चे), कबरी चलेगा ?" बूढी ताईजी फटकार लगाती हैं |
"चलता हूँ बौडीजी(ताईजी), चलता हूँ |" ड्राईवर हाथ रगड़ते हुए, मफलर से फिल्टर हुई आवाज में बोलता है | "अर तुमि को हो रही है भारी अब्यार(देर) ऑफिस जाने की |"
रोहित और मैं एक दूसरे की तरफ देखते हैं, मुस्कुराते हुए | "तुझको उलटी तो नहीं होगी ?" मैं पूछता हूँ |
"मत दिला साले याद |" रोहित हँसता है | रोहित अक्सर रात के ग्यारह बजे लॉबी में सिगरेट पीते हुए चीखता था - "क्या दिया इन पहाड़ों ने मुझे ?"
मैं भी उसके सुर से सुर मिलाता - "सिर्फ तड़प, बेबसी, न ख़त्म होने वाली उलटी करने की खलिश |"
'दिल्ली का लड़का' रोहित जब पहली बार यहाँ आया था तो वो लिटरली जी एम् ओ यू की बस के खम्बे में लटककर आया था | हर मोड़ पर उसे लगता कि बस खाई में जाने वाली है, और ड्राईवर बस मोड़ ही नहीं रहा | माँ मेरी उम्र हमेशा नौ से कम बताती थी ताकि मेरा हाफ टिकेट लिया जाए | उस वक़्त मुझे चुप रहकर यात्रा करनी होती | एक दिन ऐसे ही बस में ऐसे ही गुनगुना रहा था 
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । 
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
तो एक सज्जन बोले, "बेटे ये तो गीता के पंक्तियाँ है |" तो मैंने स्कूल में रटा हुआ पूरा गीता सार, एकात्मता स्त्रोत्रम, भोजन मन्त्र सब सुना दिया | कंडक्टर ने फुल टिकेट लगाया, और माँ से खूब डांट पड़ी अपनी विद्वता दिखाने पे |

वो खूबसूरत तो थी | गढ़वाली थी, मगर घसियारिन न थी | आसमान से रंग की उसकी ड्रेस थी, जो यहाँ के लोगों के लिए कौतुहल का विषय हो सकती थी | लेकिन कोई उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था | माया बाँद, कहता है रोहित उसको | मुस्कुराती है वो | गिटार लेकर चल रही है |
"आप जानती हैं गिटार बजाना ?" मैंने निहायत भोलेपन से पूछा |
"थोडा सा" वो फिर लजाते हुए मुस्कुराती हैं, मुझे 'फ्योंली' याद आ जाती हैं | माँ ने ये कहानी नहीं सुनाई थी, ये तो ऐसे ही घर पे 'अमर उजाला' आता था, उसमे पढ़ी थी |
"गिटार की वजह से ही तो मैं और माया मिले थे |" रोहित हँसता है | माया को मैंने कहीं देखा है, कहाँ देखा है नहीं जानता | "चलो यहाँ पर बैठते हैं |" फ्योंली मुस्कुराते हुए कहती है | दूर तक फैला हुआ हरा मैदान, अनवरत | क्षितिज तक जाकर ढल जाता था, छुपा हुआ सा, अनछुआ सा |
"जाने कहाँ छुपा हुआ था ये मैदान ? मैं कई बार पौड़ी आया था , अपनी ही धुन में घूमता घामता लेकिन मुझे कभी नहीं दिखायी दिया |"
"मैं यहाँ की लोकल हूँ |" फ्योंली फिर से मुस्कुराती है | "कुछ गाओ न..." फ्योंली जिद करती है | रोहित फ्योंली की ओर देख रहा है | मैं सामने देख रहा हूँ, चौखम्भा यहाँ से भी देखता है, जरा सा बाएं देखना पड़ रहा है | बर्फ से ढके पहाड़ों की भीड़ में चौखम्भा आराम से पहचाना जाता है | चार चोटियाँ एक साथ जैसे किसी शहंशाह का ताज हो | जहाँगीर कभी चौखम्भा नहीं गया, शायद इसलिए कश्मीर को स्वर्ग कहा उसने | मेरे दिमाग में कई सारे ख्याल एक के बाद एक बुलबुलों की तरह आ रहे थे | जहाँगीर चौखम्भा जाता तो ? आछरियां पकड़ लेती उसे भी ? 

मैं उठकर चलता गया | जाते हुए एक बार पीछे मुड़कर देखने की इच्छा हुई लेकिन नहीं देखा | फ्योंली का चेहरा मुझे कुछ अनदेखा याद दिला रहा था | रास्ते में चीड, देवदार के पेड़ों के बीच से धूप छन छन कर आ रही थी | मेरी आँखों के आगे अँधेरे आ रहे थे, और कभी कभी अँधेरे भी नहीं दिखते | दोस्तों के साथ हिल मिस्ट न जाकर मैं हॉस्टल वापस आया | पूरा हॉस्टल खाली पड़ा था | कुछ कुछ वैसा ही जैसे वो अस्पताल, तीन साल पहले | जब मैं भागा भागा आया था तुम्हें अपना एंट्रंस एक्साम का रिजल्ट बताने के लिए | पिछली रात को ही तो तुम्हारे सिरहाने मैंने तुम्हें एकात्मता स्तोत्रं, गीता सार सुनाया था माँ | हाँ, थोडा भूल गया था.. तो क्या? मैं खिड़की से बाहर देखता हूँ | अगर मैं पीछे मुड़कर देखता तो क्या फ्योंली गायब हो जाती | चेहरा शक्ल बनाने लगा था | फ्योंली की शक्ल तुमसे बहुत मिलती थी माँ | मेरी आँखों में ओंस बिखर गयी, "माँ! रोहित वापस नहीं आएगा न ?"
-सुधीर 




इतने सालों तक साथ रहने के बावजूद मैंने कभी सुधीर की डायरी नहीं पढ़ी | सुधीर की डायरी का ये पहला पेज है, और अब शायद आखिरी लिखा हुआ पेज | आज सुबह से ही कुछ अनमना सा था वो | गणेश भाई की कैंटीन में हम दोनों ने चाय-समोसे खाए | हॉस्टल से छुपते हुए हम लोग घुड़दौड़ी तक पहुंचे, क्योंकि कॉलेज गेट पर इतनी सुबह ट्रैकर नहीं मिलते | वहां पर देवप्रयाग से आ रही जी एम ओ यू की बस में बैठ गए हम | सुधीर अपने पास बैठी बुढिया को कुछ श्लोक-विश्लोक सुनाने लगा | बुढिया बेचारी एकटक सुधीर को देखे जा रही थी, बाकी लोग भी धीरे धीरे ध्यान देने लगे | सुधीर अपनी निष्कंप आवाज में एक के बाद एक श्लोक सुना रहा था | "ग्रीडी साला" मैं अपने आप से बडबडा रहा था "अटेंशन सीकर" | बस से उतरते वक़्त बुढिया की आँखों में आंसू थे, दुआ दी "जुग जुग रै नौना" | 

मैं अपना गिटार साथ ही लेकर आया था | जाने क्यों सुधीर ने माया को फ्योंली जैसा कुछ कहा | माया हँस पड़ी, उसने मुझे बताया फ्योंली किसी कहानी की नायिका है | माया और मैं मैंदान के एक कोने में बैठ गए | सुधीर हमसे थोड़ी दूर बैठ गया, जाने क्यों माया से नजरें  चुरा रहा था वो | माया की जिद पर मैंने 'एनरिके' का 'हीरो' गाया | इस दौरान सुधीर अपनी डायरी में क्या क्या लिख रहा था | सुधीर डायरी लेकर आया था, ये मुझे नहीं पता था | फिर 'सिल्क रूट' का 'डूबा डूबा' गाते हुए मेरा ध्यान एक पल को सुधीर की ओर गया | वो सामने हिमालय में खो सा गया था |उसकी आँखें मानों चौखम्भा के भी पार देख लेना चाहती हों | फिर वो एकदम से उठा और चलने लगा | मैंने गाना रोक दिया | वो बाट अबाट, बाट अबाट सा कुछ गुनगुनाता चला जा रहा था | 
माया हँस रही थी "तुम्हारा ये दोस्त भी न |" 
मुझे लग गया था कि सुबह से उसकी तबियत शायद कुछ ठीक नहीं थी | मैं चिल्लाया, "सुधीर! अबे रुक जा, मैं भी आता हूँ | हॉस्टल चलते हैं फिर |" 
वो एक पल को ठिठक गया, लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा | वो फिर से चलता हुआ मैदान की ढलान से उतर गया | मैं जब तक भागता हुआ पहुंचता, वो कहीं नज़र नहीं आ रहा था | माया ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे रोक दिया, "जाने दो उसे, बहुत खुश है वो आज |" 
मैं लौटकर वापस आ गया | माया जो कुछ कह रही थी, मेरा ध्यान सिर्फ सुधीर पर लगा हुआ था | दूर से मुझे एक बहुत खूबसूरत सा गाँव दिखायी दे रहा था | सफ़ेद छोटे छोटे पहाड़ी घर | बर्फ में ढंके हुए उनके आँगन को बुहारती आसमानी रंग के परिधान में छोटी छोटी लडकियाँ | और वहां कोने में शायद सुधीर भी है, वो मुड़ा, मुझे देख के मुस्कुराया | 
"अच्छा रोहित! मैं चलती हूँ" कहते हुए माया ने मेरी तन्द्रा भंग की | माया चलने लगी,  मैदान के उसी ढलान से वो नीचे उतर गयी | उसके जाने के बाद मैं हॉस्टल जाने के लिए मुड़ा | सुधीर को इन सब पहाड़ी रास्तों का पता है, वो शाम को खुद ही हॉस्टल आ जायेगा | मैं अगर उसे ढूँढने जाऊँगा तो मैं खुद ही खो जाऊँगा | वापस जाते हुए मैंने मैदान के कोने में लगे बैनर पर उड़ती उड़ती नज़र डाली 'माया नेगी मेमोरिअल क्रिकेट टूर्नामेंट १८ जनवरी से' | ट्रैकर को पैसे देते वक़्त मैंने जेब में हाथ डाला तो सुधीर का टूटा हुआ काला मोटा सा धागा मेरी जेब में था, जाने कब मुझे दे गया था वो | काश, वो धागा पहन के रखता...

हॉस्टल वापस आकर मैंने सुधीर की डायरी पढ़ी | माया नेगी की मौत तीन साल पहले एक प्लेन क्रेश में हो गयी थी, उसी दिन जिस दिन सुधीर की माँ की मौत हुई थी | सुधीर की डायरी में उस हादसे की कई तस्वीरें थी | सुधीर हॉस्टल वापस नहीं आया था, इन फैक्ट सुधीर उस दिन के बाद फिर कभी नहीं लौटा | वैसे जाने क्यों मुझे लगा ही था कि वो नहीं आएगा | कभी कभी कुछ लोगों को दिख जाता है उसी मैदान पे, सुबह ११ बजे, वैसे ही बैठे हुए, चौखम्भा को देखते हुए |


हाई मॉम!  हाई डैड!
मातृभाषा और संस्कृति , जिन दो चीज़ों पर आपने थेसिस लिखने को मुझे यहाँ गाँव में जबरदस्ती भेजा है, उसके रिजल्ट मैं किसी दिन दादी से ऑनलाइन चैटिंग करवा कर दे दूंगी | मैं ठीक हूँ, हाँ...हाँ रो रही हूँ | लेकिन मैं खुश हूँ | रोहित से मिली आज, आखिरी बार | अब शायद वो सुधीर को भूल जाये और खुद को भी माफ़ कर दे | डैड, डोन' कीप टेलिंग  मी यू आर ए साइकैट्रिस्ट, इट इर्क्स | मुझे पता है कि ये आपका आईडिया था, लेकिन इसे परफोर्म करने वाली तो मैं हूँ न | कभी कभी सोचती हूँ कि काश रोहित एक नोर्मल पर्सन होता | तीन साल पहले उसकी माँ का प्लेन क्रेश में मरना, फिर बचपन से उसका इतना अंतर्मुखी और भावुक होना, ये सब उसे विश्वास दिलाते रहे सुधीर के अस्तित्व का | उसके पापा ने सारा वक़्त और पैसा माया नेगी मेमोरिअल क्रिकेट क्लब में लगा दिया | दिल्ली से वापस अपने गाँव पौड़ी आना, उन्ही जगहों को देखना, जहाँ उसने बचपन गुज़ारा था | तन्हाइयों में भटकते रहना खुद को सुधीर समझकर | उफ़ कैसी उलझी हुई मनोदशा में रहता था होगा वो| लेकिन अगर वो ऐसा न होता तो शायद हम लोग मिलते भी नहीं | एक साल के लिए दादी के पास आई हुई मैं, उसे किसी और अजनबी की तरह नज़रअंदाज कर जाती | कितना मासूम सा है वो, कभी वो मेरी गोद में सर रखकर सो जाता, बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह ... मॉम , शादी से पहले ही माँ बन गयी थी मैं, उस छोटे  बच्चे की  :) |  डैड! बीच बीच में खुद को दोषी भी महसूस किया | उसकी निश्छल भावनाओं को धोखा तो नहीं दिया न मैंने कहीं , उसे ये यकीन दिलाकर कि हाँ सुधीर की माँ कोई परी है, कोई एंजेल जो सुधीर को लेने आई है | उसे जानबूझकर मैं उसी जगह ले गयी जिस जगह को वो अवोइड करता था, पौड़ी क्रिकेट ग्राउंड | आज सुबह से बहुत खुश था वो,  बीच बीच में अंतर्मुखी भी हो जाता | फिर गिटार पर उसने हीरो सुनाया 'वुड यू सेव माइ सोल टुनाईट!' कई बार दिल गले तक आ जा रहा था, पूरी कोशिश की कि उसके सामने ना रोने लगूं | फिर उसका करेंट फेवरिट 'डूबा डूबा', बीच में रुक गया | "वो सुधीर जा रहा है, सुधीर... रुक मैं भी चलता हूँ |" रोकने की कोशिश की उसने सुधीर को | "जाने दो उसे, आज बहुत खुश है वो |" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर सुधीर की लाइफ को फुल स्टॉप कर दिया | शायद अपनी भी | डैड! वो अपना ख़याल रख लेगा न अब |

मैं जानती हूँ कि अब मुझे वो कभी नहीं मिल सकता | मैं उसके सामने भी नहीं आ सकती | मॉम,  प्लीज़ फिर से ये मत कहने लगना कि बेलफास्ट आ जाओ | डैड! समझाओ न मॉम को, मुझे अभी मेरे हाल पे छोड़ दो :( | क्या हुआ जो वो मुझे नहीं मिल सकता , छुप छुप के देख तो सकती हूँ न उसे यहाँ इंडिया में | शायद ये दौर गुज़र जाए, लेकिन तब तक मुझे हर एक पल का मज़ा लेने दो | अभी तो मुझे भटकते रहना है उसके आसपास प्रेत बनकर | शायद ये पूरी जिंदगी यूँ ही गुज़ार दूँ , एक आछरी बनकर |

युअर लवली 'आछरी'
माया