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आछरियाँ




स्थान : पौड़ी 
दिनांक : १-१-२००७ 
समय : १०:४५ पूर्वान्ह
नए साल की नयी सुबह | पौड़ी की सर्दियाँ बहुत खूबसूरत होती हैं, और उससे भी ज्यादा खूबसूरत उस पहाड़ी कसबे की ओंस से भीगी सड़कें | सुबह उठते ही एकदम सामने चौखम्भा पर्वत दिखायी देता है | कौन रहता होगा वहां ? इंसान तो क्या ही पहुंचा होगा | क्या कोई देवता ? माँ कहती है कि आछरियाँ(परियाँ) ऐसी जगहों पर रहती हैं जहाँ तुम्हारा ध्यान  बार बार जाए, वो जगह इंसानों के लिए दुर्लभ हों | माँ कहती कि ऐसी जगहों पर नहीं जाना चाहिए, और अगर कुछ तुम्हें दिखायी भी दे तो अपनी आखों पे भरोसा मत करना | यह सब छल है, डरना मत बिलकुल भी | आछरियाँ किसी पर मुग्ध होती हैं, किसी की बातों पर, किसी की सच्चाई, अच्छाई पर तो उसे छल दिखाती हैं | फिर उसी छल से उसको अपने साथ अपने लोक में लेकर चली जाती हैं | गडरिये की कहानी, जिसे आछरियां लेके चली जाती हैं, किसी पहाड़ी पत्रिका में पढ़कर मैं थोडा सा सिहरा जरूर था, लेकिन दिल ही दिल में अच्छा भी लगा कि काश मुझे भी कोई लेके चला जाता | माँ एक कहानी और भी सुनाती है, क्या थी वो कहानी मुझे याद नहीं, बस एक वाक्य याद है कहानी में | कहानी में एक चिड़िया का जिक्र होता है जो 'बाट क अबाट! अबाट क बाट' की चिहुंक लगाये रहती है | शायद इसका मतलब है कि सही रास्ते छल रास्ते है, और छल रास्ते सही | कोई नहीं जानता कि क्या सही है और क्या छल | वो चिड़िया किसी पथिक को उसके रास्तों से भटका ले जाती है | पहाड़ी कहानियों में किरदार पेड़-पौधे, जंगल-जानवर, आछरियाँ, नाग, देवता, पितर इत्यादि होते हैं | माँ को पता भी है कि मैं बहुत डरता हूँ, हर चीज़ से | काला धागा मेरे गले में मंत्रसिद्ध करवाया था, जिसे मैंने सातवीं क्लास में एक दोस्त के ललकारने पे तोड़ दिया था | मुझे हर वक़्त किसी के होने का अहसास बना रहता था | डर तो नहीं, लेकिन अजीब सिहरन जरूर पैदा होती थी |
 
चौखम्भा इतना खूबसूरत न लगता अगर बीच में एक छोटी सी पहाड़ी पे माँ दुर्गा के मंदिर की पीले रंग की पताका न दिखती तो | हॉस्टल के आसपास के वीराने में एकाएक मंदिर मानो चौखम्भा से स्पर्धा करता | अलसुबह भी कुछ लड़के कॉमन रूम में पहुँच कर टी वी चलाकर न्यूज़ या गाने देखने लगते, या अपने ही रूम पे कंप्यूटर पे कोई ताज़ा हिट हुआ गाना चला देते | लेकिन मेरे जैसे कुछ लोगों के लिए दिन शांत था | इंडिया टी वी वहां पर नहीं था, और अखबार दो-तीन दिन बाद पहुँचता था | किसी तरह की कोई जल्दी नहीं | कभी कभी रात को लाइट भी चली जाती थी | फिर तो यादों का समां बंध जाता था | कुछ दिन मैंने मंदिर के पीछे पहाड़ी के ढलान वाले हिस्से से नीचे बसे हुए छोटे छोटे गाँवों को देखते हुए भी गुज़ारे थे | इतनी सुबह, ऐसी ही जगह पर मेरे बचपन का डर फिर शक्ल लेता था कि कोई मेरे साथ है | देखो, उसकी आँखें भी मुझे दिखायी दे रही हैं | अब चेहरे ने शक्ल लेनी शुरू कर दी है | हाथ बढ़ा लूँ तो शायद छू सकता हूँ उसे | ये छल है, अपनी आँखों पे भरोसा मत करो, माँ की बातें याद आती है | मैं दूसरी तरफ देखने लगता हूँ, फिर वापस देखता हूँ | वो चेहरा अब नहीं है | काश उन पलों में मैं दूसरी तरफ नहीं  देखता तो ये छल मुझे लेके चला जाता | सूरज निकलने वाला था | गणेश भाई की कैंटीन तक जाने वाली पगडण्डी पर से उगता था सूरज , मानों वही से दिन भर का लम्बा सफ़र तय करेगा | एक बूढा भी उसी रास्ते से आता था रोज़ सुबह, रात का चौकीदार था कहीं | सदियाँ कितनी ही लम्बी क्यों न हो, लगातार चलता हुआ वक़्त सबको मामूली बना देता है | जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी जीवन ठहरता नहीं है | "क्या वो बूढा भी छल है ?" मैं माँ से पूछता हूँ | गणेश भाई की केन्टीन में चाय-समोसे का लुत्फ़ उठाते मैं और रोहित | रोहित की दो महीने पहले किसी लड़की से मुलाक़ात हुई थी | मोबाइल नम्बर्स का आदान-प्रदान हुआ, और बातें होने लगी | अक्सर हॉस्टल की लॉबी में उसे बादलों को छूते हुए देखता हूँ | खिड़की खोलते ही हल्के हल्के जहाँ नमी कपड़ों को भिगो देती है, वहां वो बेचारा ठण्ड से ठिठुरता हुआ खड़ा रहता है | आज उसके साथ पौड़ी जा रहा हूँ, उसकी फ़ोन-फ्रेंड से मिलने | "पता नहीं, किस गढ़वाली घसियारिन से प्यार हुआ होगा तुझे ?" मैं कहता हूँ, रास्ते में आई झाड़ियाँ हटाते हुए | हम दोनों हॉस्टल से नजरें बचाते हुए जा रहे थे, उसी पगडण्डी पर जहाँ से सूरज निकलता है |

आज पहली सुबह है नए साल की तो यकीनन सारे दोस्त लोग, लड़के-लड़कियां, सीनियर-जूनियर आज पौड़ी घूमने के लिए आयेंगे | इसके अलावा हमारे कॉलेज के पास कोई विकल्प भी नहीं है |
"वे सब लोग कंडोलिया मंदिर की तरफ जायेंगे, हम दूसरी तरफ निकल जायेंगे, श्रीनगर वाली रोड की तरफ " रोहित हँसते हुए कहता है "बाद में जब मैं उससे मिल लूँगा तो तू कंडोलिया वालों के साथ हिल मिस्ट में चले जाना, वहीँ जायेंगे वो लोग खाना खाने |"
कंडोलिया गया था मैं एक बार | दूसरी क्लास में कंडोलिया घूमने के लिए स्कूल का टूर गया था | घर आकर मैंने माँ के पैरों को पकड़कर अपना मुँह छुपा लिया था उसके आँचल में | "माँ! आचार जी कहते हैं कि वहां पे स्वर्ग है | माँ चलो न, हम लोग वही पे रहेंगे | ठीक है न ?" माँ हँस रही थी जो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था | मैं पूरी तरह से सीरिअस हूँ, और माँ मजाक बना रही है | "ठीक है, ठीक है, पहले बड़ा हो जा, फिर सोचना |" शीतल ने मुझे धक्का देकर जब पानी पहले पिया तो अपनी गढ़वाली हिंदी में सकपकाते हुए मैंने पूछा, "ये तुमारा है ? यख म तुमारा नाम लिखा है ?"और उसने उंगली से वहां को इशारा किया जहाँ शीतल जल लिखा हुआ था | "वो मुझे छछूंदर कहती है माँ, मुझे तो पता भी नहीं वो कैसा दिखता है... माँ, क्या शीतल भी आछरी है ?"

कॉलेज गेट पर एंट्री कभी करनी पड़ती है, कभी नहीं | आज नहीं करने का दिन था | वैसे भी हम लोगों की गार्ड से जान पहचान बन गयी थी | पौड़ी जाने के लिए ट्रैकर लगा हुआ था | हम लोग पीछे की सीटों पर बैठ गए |
"चल नौना(बच्चे), कबरी चलेगा ?" बूढी ताईजी फटकार लगाती हैं |
"चलता हूँ बौडीजी(ताईजी), चलता हूँ |" ड्राईवर हाथ रगड़ते हुए, मफलर से फिल्टर हुई आवाज में बोलता है | "अर तुमि को हो रही है भारी अब्यार(देर) ऑफिस जाने की |"
रोहित और मैं एक दूसरे की तरफ देखते हैं, मुस्कुराते हुए | "तुझको उलटी तो नहीं होगी ?" मैं पूछता हूँ |
"मत दिला साले याद |" रोहित हँसता है | रोहित अक्सर रात के ग्यारह बजे लॉबी में सिगरेट पीते हुए चीखता था - "क्या दिया इन पहाड़ों ने मुझे ?"
मैं भी उसके सुर से सुर मिलाता - "सिर्फ तड़प, बेबसी, न ख़त्म होने वाली उलटी करने की खलिश |"
'दिल्ली का लड़का' रोहित जब पहली बार यहाँ आया था तो वो लिटरली जी एम् ओ यू की बस के खम्बे में लटककर आया था | हर मोड़ पर उसे लगता कि बस खाई में जाने वाली है, और ड्राईवर बस मोड़ ही नहीं रहा | माँ मेरी उम्र हमेशा नौ से कम बताती थी ताकि मेरा हाफ टिकेट लिया जाए | उस वक़्त मुझे चुप रहकर यात्रा करनी होती | एक दिन ऐसे ही बस में ऐसे ही गुनगुना रहा था 
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । 
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
तो एक सज्जन बोले, "बेटे ये तो गीता के पंक्तियाँ है |" तो मैंने स्कूल में रटा हुआ पूरा गीता सार, एकात्मता स्त्रोत्रम, भोजन मन्त्र सब सुना दिया | कंडक्टर ने फुल टिकेट लगाया, और माँ से खूब डांट पड़ी अपनी विद्वता दिखाने पे |

वो खूबसूरत तो थी | गढ़वाली थी, मगर घसियारिन न थी | आसमान से रंग की उसकी ड्रेस थी, जो यहाँ के लोगों के लिए कौतुहल का विषय हो सकती थी | लेकिन कोई उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था | माया बाँद, कहता है रोहित उसको | मुस्कुराती है वो | गिटार लेकर चल रही है |
"आप जानती हैं गिटार बजाना ?" मैंने निहायत भोलेपन से पूछा |
"थोडा सा" वो फिर लजाते हुए मुस्कुराती हैं, मुझे 'फ्योंली' याद आ जाती हैं | माँ ने ये कहानी नहीं सुनाई थी, ये तो ऐसे ही घर पे 'अमर उजाला' आता था, उसमे पढ़ी थी |
"गिटार की वजह से ही तो मैं और माया मिले थे |" रोहित हँसता है | माया को मैंने कहीं देखा है, कहाँ देखा है नहीं जानता | "चलो यहाँ पर बैठते हैं |" फ्योंली मुस्कुराते हुए कहती है | दूर तक फैला हुआ हरा मैदान, अनवरत | क्षितिज तक जाकर ढल जाता था, छुपा हुआ सा, अनछुआ सा |
"जाने कहाँ छुपा हुआ था ये मैदान ? मैं कई बार पौड़ी आया था , अपनी ही धुन में घूमता घामता लेकिन मुझे कभी नहीं दिखायी दिया |"
"मैं यहाँ की लोकल हूँ |" फ्योंली फिर से मुस्कुराती है | "कुछ गाओ न..." फ्योंली जिद करती है | रोहित फ्योंली की ओर देख रहा है | मैं सामने देख रहा हूँ, चौखम्भा यहाँ से भी देखता है, जरा सा बाएं देखना पड़ रहा है | बर्फ से ढके पहाड़ों की भीड़ में चौखम्भा आराम से पहचाना जाता है | चार चोटियाँ एक साथ जैसे किसी शहंशाह का ताज हो | जहाँगीर कभी चौखम्भा नहीं गया, शायद इसलिए कश्मीर को स्वर्ग कहा उसने | मेरे दिमाग में कई सारे ख्याल एक के बाद एक बुलबुलों की तरह आ रहे थे | जहाँगीर चौखम्भा जाता तो ? आछरियां पकड़ लेती उसे भी ? 

मैं उठकर चलता गया | जाते हुए एक बार पीछे मुड़कर देखने की इच्छा हुई लेकिन नहीं देखा | फ्योंली का चेहरा मुझे कुछ अनदेखा याद दिला रहा था | रास्ते में चीड, देवदार के पेड़ों के बीच से धूप छन छन कर आ रही थी | मेरी आँखों के आगे अँधेरे आ रहे थे, और कभी कभी अँधेरे भी नहीं दिखते | दोस्तों के साथ हिल मिस्ट न जाकर मैं हॉस्टल वापस आया | पूरा हॉस्टल खाली पड़ा था | कुछ कुछ वैसा ही जैसे वो अस्पताल, तीन साल पहले | जब मैं भागा भागा आया था तुम्हें अपना एंट्रंस एक्साम का रिजल्ट बताने के लिए | पिछली रात को ही तो तुम्हारे सिरहाने मैंने तुम्हें एकात्मता स्तोत्रं, गीता सार सुनाया था माँ | हाँ, थोडा भूल गया था.. तो क्या? मैं खिड़की से बाहर देखता हूँ | अगर मैं पीछे मुड़कर देखता तो क्या फ्योंली गायब हो जाती | चेहरा शक्ल बनाने लगा था | फ्योंली की शक्ल तुमसे बहुत मिलती थी माँ | मेरी आँखों में ओंस बिखर गयी, "माँ! रोहित वापस नहीं आएगा न ?"
-सुधीर 




इतने सालों तक साथ रहने के बावजूद मैंने कभी सुधीर की डायरी नहीं पढ़ी | सुधीर की डायरी का ये पहला पेज है, और अब शायद आखिरी लिखा हुआ पेज | आज सुबह से ही कुछ अनमना सा था वो | गणेश भाई की कैंटीन में हम दोनों ने चाय-समोसे खाए | हॉस्टल से छुपते हुए हम लोग घुड़दौड़ी तक पहुंचे, क्योंकि कॉलेज गेट पर इतनी सुबह ट्रैकर नहीं मिलते | वहां पर देवप्रयाग से आ रही जी एम ओ यू की बस में बैठ गए हम | सुधीर अपने पास बैठी बुढिया को कुछ श्लोक-विश्लोक सुनाने लगा | बुढिया बेचारी एकटक सुधीर को देखे जा रही थी, बाकी लोग भी धीरे धीरे ध्यान देने लगे | सुधीर अपनी निष्कंप आवाज में एक के बाद एक श्लोक सुना रहा था | "ग्रीडी साला" मैं अपने आप से बडबडा रहा था "अटेंशन सीकर" | बस से उतरते वक़्त बुढिया की आँखों में आंसू थे, दुआ दी "जुग जुग रै नौना" | 

मैं अपना गिटार साथ ही लेकर आया था | जाने क्यों सुधीर ने माया को फ्योंली जैसा कुछ कहा | माया हँस पड़ी, उसने मुझे बताया फ्योंली किसी कहानी की नायिका है | माया और मैं मैंदान के एक कोने में बैठ गए | सुधीर हमसे थोड़ी दूर बैठ गया, जाने क्यों माया से नजरें  चुरा रहा था वो | माया की जिद पर मैंने 'एनरिके' का 'हीरो' गाया | इस दौरान सुधीर अपनी डायरी में क्या क्या लिख रहा था | सुधीर डायरी लेकर आया था, ये मुझे नहीं पता था | फिर 'सिल्क रूट' का 'डूबा डूबा' गाते हुए मेरा ध्यान एक पल को सुधीर की ओर गया | वो सामने हिमालय में खो सा गया था |उसकी आँखें मानों चौखम्भा के भी पार देख लेना चाहती हों | फिर वो एकदम से उठा और चलने लगा | मैंने गाना रोक दिया | वो बाट अबाट, बाट अबाट सा कुछ गुनगुनाता चला जा रहा था | 
माया हँस रही थी "तुम्हारा ये दोस्त भी न |" 
मुझे लग गया था कि सुबह से उसकी तबियत शायद कुछ ठीक नहीं थी | मैं चिल्लाया, "सुधीर! अबे रुक जा, मैं भी आता हूँ | हॉस्टल चलते हैं फिर |" 
वो एक पल को ठिठक गया, लेकिन उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा | वो फिर से चलता हुआ मैदान की ढलान से उतर गया | मैं जब तक भागता हुआ पहुंचता, वो कहीं नज़र नहीं आ रहा था | माया ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे रोक दिया, "जाने दो उसे, बहुत खुश है वो आज |" 
मैं लौटकर वापस आ गया | माया जो कुछ कह रही थी, मेरा ध्यान सिर्फ सुधीर पर लगा हुआ था | दूर से मुझे एक बहुत खूबसूरत सा गाँव दिखायी दे रहा था | सफ़ेद छोटे छोटे पहाड़ी घर | बर्फ में ढंके हुए उनके आँगन को बुहारती आसमानी रंग के परिधान में छोटी छोटी लडकियाँ | और वहां कोने में शायद सुधीर भी है, वो मुड़ा, मुझे देख के मुस्कुराया | 
"अच्छा रोहित! मैं चलती हूँ" कहते हुए माया ने मेरी तन्द्रा भंग की | माया चलने लगी,  मैदान के उसी ढलान से वो नीचे उतर गयी | उसके जाने के बाद मैं हॉस्टल जाने के लिए मुड़ा | सुधीर को इन सब पहाड़ी रास्तों का पता है, वो शाम को खुद ही हॉस्टल आ जायेगा | मैं अगर उसे ढूँढने जाऊँगा तो मैं खुद ही खो जाऊँगा | वापस जाते हुए मैंने मैदान के कोने में लगे बैनर पर उड़ती उड़ती नज़र डाली 'माया नेगी मेमोरिअल क्रिकेट टूर्नामेंट १८ जनवरी से' | ट्रैकर को पैसे देते वक़्त मैंने जेब में हाथ डाला तो सुधीर का टूटा हुआ काला मोटा सा धागा मेरी जेब में था, जाने कब मुझे दे गया था वो | काश, वो धागा पहन के रखता...

हॉस्टल वापस आकर मैंने सुधीर की डायरी पढ़ी | माया नेगी की मौत तीन साल पहले एक प्लेन क्रेश में हो गयी थी, उसी दिन जिस दिन सुधीर की माँ की मौत हुई थी | सुधीर की डायरी में उस हादसे की कई तस्वीरें थी | सुधीर हॉस्टल वापस नहीं आया था, इन फैक्ट सुधीर उस दिन के बाद फिर कभी नहीं लौटा | वैसे जाने क्यों मुझे लगा ही था कि वो नहीं आएगा | कभी कभी कुछ लोगों को दिख जाता है उसी मैदान पे, सुबह ११ बजे, वैसे ही बैठे हुए, चौखम्भा को देखते हुए |


हाई मॉम!  हाई डैड!
मातृभाषा और संस्कृति , जिन दो चीज़ों पर आपने थेसिस लिखने को मुझे यहाँ गाँव में जबरदस्ती भेजा है, उसके रिजल्ट मैं किसी दिन दादी से ऑनलाइन चैटिंग करवा कर दे दूंगी | मैं ठीक हूँ, हाँ...हाँ रो रही हूँ | लेकिन मैं खुश हूँ | रोहित से मिली आज, आखिरी बार | अब शायद वो सुधीर को भूल जाये और खुद को भी माफ़ कर दे | डैड, डोन' कीप टेलिंग  मी यू आर ए साइकैट्रिस्ट, इट इर्क्स | मुझे पता है कि ये आपका आईडिया था, लेकिन इसे परफोर्म करने वाली तो मैं हूँ न | कभी कभी सोचती हूँ कि काश रोहित एक नोर्मल पर्सन होता | तीन साल पहले उसकी माँ का प्लेन क्रेश में मरना, फिर बचपन से उसका इतना अंतर्मुखी और भावुक होना, ये सब उसे विश्वास दिलाते रहे सुधीर के अस्तित्व का | उसके पापा ने सारा वक़्त और पैसा माया नेगी मेमोरिअल क्रिकेट क्लब में लगा दिया | दिल्ली से वापस अपने गाँव पौड़ी आना, उन्ही जगहों को देखना, जहाँ उसने बचपन गुज़ारा था | तन्हाइयों में भटकते रहना खुद को सुधीर समझकर | उफ़ कैसी उलझी हुई मनोदशा में रहता था होगा वो| लेकिन अगर वो ऐसा न होता तो शायद हम लोग मिलते भी नहीं | एक साल के लिए दादी के पास आई हुई मैं, उसे किसी और अजनबी की तरह नज़रअंदाज कर जाती | कितना मासूम सा है वो, कभी वो मेरी गोद में सर रखकर सो जाता, बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह ... मॉम , शादी से पहले ही माँ बन गयी थी मैं, उस छोटे  बच्चे की  :) |  डैड! बीच बीच में खुद को दोषी भी महसूस किया | उसकी निश्छल भावनाओं को धोखा तो नहीं दिया न मैंने कहीं , उसे ये यकीन दिलाकर कि हाँ सुधीर की माँ कोई परी है, कोई एंजेल जो सुधीर को लेने आई है | उसे जानबूझकर मैं उसी जगह ले गयी जिस जगह को वो अवोइड करता था, पौड़ी क्रिकेट ग्राउंड | आज सुबह से बहुत खुश था वो,  बीच बीच में अंतर्मुखी भी हो जाता | फिर गिटार पर उसने हीरो सुनाया 'वुड यू सेव माइ सोल टुनाईट!' कई बार दिल गले तक आ जा रहा था, पूरी कोशिश की कि उसके सामने ना रोने लगूं | फिर उसका करेंट फेवरिट 'डूबा डूबा', बीच में रुक गया | "वो सुधीर जा रहा है, सुधीर... रुक मैं भी चलता हूँ |" रोकने की कोशिश की उसने सुधीर को | "जाने दो उसे, आज बहुत खुश है वो |" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर सुधीर की लाइफ को फुल स्टॉप कर दिया | शायद अपनी भी | डैड! वो अपना ख़याल रख लेगा न अब |

मैं जानती हूँ कि अब मुझे वो कभी नहीं मिल सकता | मैं उसके सामने भी नहीं आ सकती | मॉम,  प्लीज़ फिर से ये मत कहने लगना कि बेलफास्ट आ जाओ | डैड! समझाओ न मॉम को, मुझे अभी मेरे हाल पे छोड़ दो :( | क्या हुआ जो वो मुझे नहीं मिल सकता , छुप छुप के देख तो सकती हूँ न उसे यहाँ इंडिया में | शायद ये दौर गुज़र जाए, लेकिन तब तक मुझे हर एक पल का मज़ा लेने दो | अभी तो मुझे भटकते रहना है उसके आसपास प्रेत बनकर | शायद ये पूरी जिंदगी यूँ ही गुज़ार दूँ , एक आछरी बनकर |

युअर लवली 'आछरी'
माया 



टिप्पणियाँ

anjule shyam ने कहा…
आछरियाँ पता नहीं होती हैं या नहीं....गायब हो चूका हूँ....डूब गया हूँ इस कहानी में.....हाँ इस कहानी ने मुझे अपना जरुर बना..लिया...शुक्रिया इस पोस्ट के लिए..
Manoj K ने कहा…
कहाँ से कहाँ ले आये.. माया थी और नहीं भी.
एक सांस में पूरी कहानी पढ़ गया, कोई विचित्र पात्र नहीं, कोई सस्पेंस नहीं, निश्चल बहती धारा कि तरह...

i m feeling lucky today..
बेनामी ने कहा…
Just wonderful...
Shah Nawaz ने कहा…
खूबसूरत संस्मरण नानी की कहानियों में भी अक्सर परियों (आछरियाँ) की बातें होती थी.... पता नहीं परियां होती है या नहीं, लेकिन यादें बहुत हसीं होती हैं...
Smart Indian ने कहा…
लाजवाब! कोई इसे कहानी कहे मैं तो जादू ही कहूंगा, अलौकिक जादू! बाकी पोस्ट्स भी पढता हूँ अभी।
Neeraj ने कहा…
@ anjule shyam जी,
आछरियाँ होती हैं.. बस अच्छे या बुरे .. नहीं पहचान सकते... जैसे माया :)
कहानी को आपने भी अपनाया, उसके लिए बहुत धन्यवाद

@मनोज
क्षमा करना दोस्त, कहानी को maine बाद में काफी बदल दिया| मैं पहले वही रखता जिस पर आपने कमेन्ट किया है , मतलब माया होती भी और नहीं भी| लेकिन मुझे लगा कि अभी इस कहानी में अपूर्णता है, माया को न्यायोचित ठहराना जरूरी था|

@बेनामी जी ,
आपके wonderful कमेन्ट के लिए धन्यवाद|

@ शाह नवाज़,
इसमें संस्मरण सिर्फ आछरियों के अस्तित्व की बात करना है| बाकी इसे कहानी समझा जाए तो मुझे ख़ुशी होगी| हाँ, मैंने तीनों चरित्रों को प्रथम पुरुष रखते हुए एक ही घटना की विवेचना तीन अलग अलग एंगल से की है|

@स्मार्ट इंडियन ,
ये जादू आपको बांधे रखे, हर पोस्ट के साथ मेरी यही कोशिश रहेगी|
आपकी रचना बहुत अच्छी लगी .. आपकी रचना आज दिनाक ३ दिसंबर को चर्चामंच पर रखी गयी है ... http://charchamanch.blogspot.com
Neeraj ने कहा…
बहुत बहुत धन्यवाद , नूतन जी
बहुत से उतार चढ़ाव और अलग अलग रंग समेटे है ये कहानी। शुरू से आखिर तक आते-आते कई शेड्स से होकर गुजरना पढ़ा।
सुखांत है या दुखांत, फ़ैसला नहीं कर पाया मैं।
आज से आपका एक फ़ैन और बढ़ गया है, नीरज।
एक बात तो कहना भूल ही गया था -
"आछरियाँ किसी पर मुग्ध होती हैं, किसी की बातों पर, किसी की सच्चाई, अच्छाई पर तो उसे छल दिखाती हैं" - बराबर लिखा है बिल्कुल, मैं सैकंड करता हूँ इस विचार को, अगर हमारा समर्थन कुछ मूल्य रखता है तो:)

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