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संदेश

हीरो की कहानी, परिंदे की जुबानी

"अभी न, मैं तुम्हारे लिए कहानी का टाइटल सोच रही थी " "अच्छा ? क्या सोचा ?" "अभी मैं आ रही थी न, स्टैंड पे... तो वही कुत्ता था वहाँ पे परसों वाला, रो रहा था... उसे देख के मुझे टाइटल सूझी" "कुत्ते को देख के टाइटल ?" मैं हँसने लगा, वो भी हँसने लगी | "अरे सुनो न स्टुपिड! तुम मुझे भुला दोगे नहीं तो |" "ओके बाबा, बोलो |" "हाँ तो टाइटल है, हीरो की कहानी, परिंदे की जुबानी |" "वाह क्या टाइटल है !" मैंने उपहास किया | "अच्छा है न ?" "हाँ , लेकिन कुत्ते से तुम्हें ये टाइटल क्यों सूझा ? कुत्ता तो पूरे टाइटल में कहीं नहीं है |" मैंने अपनी हँसी को किसी तरह रोका हुआ था | "पता नहीं" वो थोड़ा उदास हो गयी, "मैंने बहुत कोशिश किया, लेकिन उसके लिए जगह ही नहीं बनी टाइटल में, मे बी दैट लिल डॉग इंस्पायर्ड मी |" "हाँ, शायद | तुम इसका नाम हीरो की कहानी, कुत्ते की जुबानी भी तो रख सकते थे |" "तुमको मेरा टाइटल पसंद आया न ?" उसने उम्मीद से पूछा | "मैं परिंदों का पसीना रख ल...

'wow! wonderful story'

तु म वो बेनामी हो, जो मेरी कहानियाँ समझ में नहीं आने पे भी कहती हो, 'wow! wonderful story' | तुम सही में नहीं जानती हो कि तुमने मेरी कहानियों का अंत किस हद तक 'wonderful' कर दिया है | मेरे जन्मदिन पर तुमने पहली बार लिखने की कोशिश की, मुझे बर्थडे सरप्राइज़ देने के लिए | वैसे तुमने एक दिन पहले कहा कि हम अब बात नहीं करेंगे | मुझे इतना पता है कि तुम मुझसे कुछ न कुछ कहे बिना नहीं रह सकती, इसलिए मन ही मन हँसते हुए मैंने हाँ कह दी | रोज़, सुबह 8 बजकर 30 मिनट पे तुम्हारा कॉल आता है, और तुम पूरे पंद्रह मिनट परेशान करती हो | आज तुम्हारा कॉल नहीं आया, और तुम मुझे 11 बजे तक परेशान करती रही | सबसे पहले विश करने की ये होड़ तुम्हारी, आखिर किससे थी | मुझे तो वैसे भी कोई उम्मीद नहीं थी कि तुम्हें कोई प्रतिद्वंदी मिलेगा | अपने पूरे परिवार को जगाके मुझे बर्थडे विश करवाना, तुम्हारे पापा जरूर तुम्हारे लक्षण देखके 'हाथ से निकल गयी लड़की' कह रहे होंगे | दूर दूर रहते हैं, कैम में देखते ही, एक दूसरे को देखकर जी भर के हँसते हैं | मेरी पिछली तीन गर्ल फ्रेंड्स के एवज तीन बॉय फ्रेंड्स बता ...

नयी, पुरानी टिहरी

ज मनोत्री आज सुबह से कुछ अनमनी सी थी | सर्दियों की धूप वैसे भी मन को अन्यत्र कहीं ले जाती है | इतवार का दिन सारे लोग घर पर ही थे, छत पर धूप सेंकने के लिए | जेठ जेठानी, उनके बेटे-बहुएँ, पोता  प्रतीक भी अपनी छत पर घाम ताप रहे थे | ऐसा नहीं कि अलग छत पे हों, दोनों छत मिली हुई थी | लेकिन मनोमालिन्य ने दूरियों को एक छत से ज्यादा बढ़ा दिया था | सुधीर छुटियाँ लेकर आया था, बहू भी साथ आई थी, अमेरिका से | अमेरिका बोलने में जमनोत्री को मे पर काफी जोर डालना पड़ता था | सुधीर के पापा तो सुबह ही उठकर भजन गाने लगते हैं, अभी भी इस आदत को नहीं छोड़ा |  "बस भी करो, थोड़ा धीमे बोलो या चुपचाप सो जाओ, बच्चे सो रहे हैं |" जमनोत्री ने उलाहना दिया| सुधीर के पापा गाते रहे "इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें..." हारकर जमनोत्री को उठना पड़ा |  बहू अमेरिका से साड़ी लेकर आई थी |  "नहीं मम्मी जी, इसे पहनो... देखो, आप पर कितनी अच्छी लग रही है |"  जमनोत्री हतप्रभ थी- "उस देश में साड़ी मिलती है क्या ? साड़ी पहनती है तू वहां ?"  सुधीर नाश्ता करते हुए बोला - "अरे माँ...

रामकथा - डेमोक्रेसी काण्ड

(अगर इस कहानी के पात्र काल्पनिक है, तो ये वास्तविकता नहीं, बहुत बड़ा षड्यंत्र है) कै केयी कोपभवन में थी, दशरथ आये, लाइट ऑन की, चेयर खींच के बैठ गए | लॉर्ड माउंटबेटन अभी भी नाराज बैठी थी, दशरथ की आँखों से हिन्दुस्तान की बेबसी झलक रही थी | "आपने दो वचन देने का वादा किया था, याद है न ?" अँगरेज़ सरकार अभी इतनी आसानी से माल-मत्ते वाला देश छोड़ने को तैयार न थी | "हाँ प्रिये!" नेहरूजी का डर सतह पर आ गया | "मेरा पहला वचन है कि अयोध्या में इस बार बड़ा बेटा गद्दी पर नहीं बैठेगा | देश में अब डेमोक्रसी होगी | हर कोई , हर किसी का शोषण नहीं करेगा | आम चुनाव से चुने गए ख़ास आदमियों को ही शोषण का हक होगा |" दशरथ नाराज तो बहुत हुए किन्तु माउंटबेटन के बेलन को स्मरण कर चुप रह गए| "अपना दूसरा वचन कहो महारानी कैपिटलिस्ट!" उद्धरण सुनकर कैकेयी मुस्कुराई | "सुमित्रा के पुत्रों को चुनाव लड़ने का हक नहीं होगा |" दशरथ ने दिल पर हाथ रखा किन्तु हृदयगति नहीं रुकी, "तुमने राम के लिए वनवास तो माँगा ही नहीं ?" माउंटबेटन  ने बड़े बेपरवाह भाव से जवाब दिया - ...

आछरियाँ

स्थान : पौड़ी  दिनांक : १-१-२००७  समय : १०:४५ पूर्वान्ह नए साल की नयी सुबह | पौड़ी की सर्दियाँ बहुत खूबसूरत होती हैं, और उससे भी ज्यादा खूबसूरत उस पहाड़ी कसबे की ओंस से भीगी सड़कें | सुबह उठते ही एकदम सामने चौखम्भा पर्वत दिखायी देता है | कौन रहता होगा वहां ? इंसान तो क्या ही पहुंचा होगा | क्या कोई देवता ? माँ कहती है कि आछरियाँ(परियाँ) ऐसी जगहों पर रहती हैं जहाँ तुम्हारा ध्यान  बार बार जाए, वो जगह इंसानों के लिए दुर्लभ हों | माँ कहती कि ऐसी जगहों पर नहीं जाना चाहिए, और अगर कुछ तुम्हें दिखायी भी दे तो अपनी आखों पे भरोसा मत करना | यह सब छल है, डरना मत बिलकुल भी | आछरियाँ किसी पर मुग्ध होती हैं, किसी की बातों पर, किसी की सच्चाई, अच्छाई पर तो उसे छल दिखाती हैं | फिर उसी छल से उसको अपने साथ अपने लोक में लेकर चली जाती हैं | गडरिये की कहानी, जिसे आछरियां लेके चली जाती हैं, किसी पहाड़ी पत्रिका में पढ़कर मैं थोडा सा सिहरा जरूर था, लेकिन दिल ही दिल में अच्छा भी लगा कि काश मुझे भी कोई लेके चला जाता | माँ एक कहानी और भी सुनाती है, क्या थी वो कहानी मुझ...

फेरी वाला

ह म ख्वाब बेचते हैं | पता नहीं कितने सालों से, शायद जब से पैदा हुआ यही काम किया, ख्वाब बेचा |  दो आने का ख्वाब खरीदा, उसे किसी नुक्कड़ पे खालिश ख्वाब कह के किसी को बेच आये | जब कभी वो शख्स दुबारा मिला तो शिकायत करता - "जनाब पिछली बार का ख्वाब आपका अच्छा नहीं रहा |"  अब अपने ख़्वाबों की बुराई किसे बुरी नहीं लगती | तुरंत तमककर बोले, "आज अगर नींद के मोहल्ले में कोई कह दे कि मेरे ख़्वाबों में वो मजा नहीं है, जायेका नहीं है, या फिर तंदुरुस्ती नहीं है, तो सब छोड़ के काशी चला जाऊं |"  ख्वाब खरीदने वाला सहम जाता है | इधर नाचीज़ देखता है कि साहब शायद नाराज हो गए, कहीं अगली बार से हमसे ख्वाब खरीदना बंद न कर दें | तुरंत चेहरे का अंदाज बदल कर कहते हैं, "अरे साहब, बाप दादों की कमाई है ये ख्वाब, उनका खून लगा है इस ख्वाब में | अपना होता तो एक बार को सुन लेता, चूं-चां भी न करता | लेकिन खानदान की याद आते ही दिल मसोस कर रह जाता हूँ |"  साहब का बिगड़ा अंदाज फिर ठीक हो जा...

स्वाल (संदेसा)

अ बकी बम्बई से कमल की चिट्ठीपत्री कुछ न आयी, तो रामचरण को थोड़ी चिंता हुई | कमल हर तीन मास में एक चिट्ठी तो लिखता, कम से कम | कहीं कुछ हो तो...न न, राम राम ये पापी प्राण भी हमेशा कुछ अपशकुनी ही सोचता है | वैसे भी पिछली चिट्ठी में उसने लिखा था कि यू पी, बिहार के पुरब्यों से है बम्बई वालों को परेशानी, हम पहाड़ियों से थोड़े ही | हमें तो जैसे ही सुनते हैं कि उत्तराखंड से है, तो खुश हो के पूछते हैं, वो रिशिकेस, हरिद्वार वाला ? कभी किसी ने पूछ लिया कि जाति क्या है, और हम बताते हैं सकलानी, ब्रह्मण हैं, गढ़वाली ब्रह्मण | पंडा जी कह कर पैर छूते हैं, आज भी | रामचरण भी बहुत खुश हुआ था चिट्ठी पढ़कर | बरसों पहले पिताजी गए थे परदेस, क्या जगह थी यार वो, काफी जजमानी थी वहां पे पिताजी की | आज तक चिट्ठी भेजते हैं वो लोग | यादों पर काफी जोर डालने पर भी रामचरण को जगह का नाम याद नहीं आया, अलबत्ता ये जरूर याद आ गया कि कमल ने चिट्ठी नहीं भेजी | यहाँ बैठे रहने से तो कुछ होगा नहीं, भागवत के लड़के को पूछ आते हैं | वो भी वहीँ था बम्बई में, आजकल छुट्टी आया हुआ है | "रमेश!ऐ रमेश!!!" रामचरण ने आँग...